सत्गुरु भगति दीजिये
( तर्ज : आज मी ब्रह्म पाहिले ... )
सत्गुरु भगति दीजिये ,
सत्गुरु भगति दीजिये ।
और सँग आवे धन - दारा ,
सब झूठे यह जगत् ।।
मोहसे , न्यारो कीजिये ।।
सत्गुरु ... ॥ टेक ।।
यद्यपि रहुँ दुनियाँके संगमें ।
जाऊँ न उनके झूठे रँगमें ॥
अन्दर मोहे तेरि हो प्रीती ;
ऐसा कीजिये ! ॥१ ॥
सब बोलूं , खेलू जनतासे ।
पाप न हो थोडा भी मुझसे ॥
ऐसी नाथ दया करिके ,
मोहे अपना लीजिये ! ॥ २ ॥
मैं बालक तुमरा कहवाऊँ ।
किनके सँग जाऊँ या गाऊँ ??
तुकड्यादास कहे ,
ऐसो वर , सरपे दीजिये ! ।। ३ ।।
रामगोपाल मंदिर , अयोध्या ;
दि . १३-८-६२
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